1,400 किलोमीटर की दौड़: जब एक फोन कॉल ने अमित अग्रवाल को नई ज़िंदगी तक पहुँचा दिया
जबलपुर से लुधियाना तक का सफ़र सिर्फ़ दूरी तय करने का नहीं था—यह ज़िंदगी और मौत के बीच की दौड़ थी।
अमित अग्रवाल, जबलपुर, मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। करीब एक साल से वे लिवर सिरोसिस से जूझ रहे थे। उन्होंने जबलपुर में कई डॉक्टरों से इलाज कराया। इसके बाद बेहतर इलाज की तलाश में भोपाल, नागपुर और दूसरे शहरों का भी रुख किया। लेकिन उनकी बीमारी और लिवर सिरोसिस की जटिलताएँ लगातार बढ़ती गईं।
काम करना मुश्किल हो गया था। स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था और परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल था—अब आगे क्या?
इसी दौरान किसी ने उन्हें पंजाब में लिवर ट्रांसप्लांट के लिए प्रसिद्ध डॉ. गुरसागर सिंह सहोता (Dr. Gursagar Singh Sahota) के बारे में बताया।
अमित अपनी पत्नी नेहा और बेटे तनय के साथ लुधियाना स्थित DMC&H पहुँचे। डॉ. सहोता और उनकी टीम ने उनकी स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन किया और उन्हें लिवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी।
लेकिन अमित के परिवार में कोई उपयुक्त लिविंग डोनर नहीं था।
अब उन्हें कैडेवरिक यानी डेड डोनर लिवर ट्रांसप्लांट के लिए इंतज़ार करना था।
परिवार वापस जबलपुर लौट गया।
फिर एक दिन फोन आया…
एक दिन अचानक डॉ. सहोता की टीम का फोन आया—
“लिवर उपलब्ध है। आपको जितनी जल्दी हो सके लुधियाना पहुँचना होगा।”
बस, इसके बाद समय बर्बाद करने का सवाल ही नहीं था।
अमित और उनके सिर्फ़ 19 साल के बेटे तनय ने जल्दी-जल्दी सामान पैक किया और रात के सफ़र पर निकल पड़े।
जबलपुर से लुधियाना—लगभग 1,400 किलोमीटर।
मध्य प्रदेश से पंजाब तक का लंबा रास्ता।
बीच में रात।
सामने अनिश्चितता।
और मन में सिर्फ़ एक उम्मीद—शायद यही वह मौका है जो ज़िंदगी बदल सकता है।
अमित की हालत इतनी खराब थी कि सामान्य जीवन भी मुश्किल हो चुका था। लेकिन इस सफ़र के दौरान उन्होंने खुद भी काफी दूरी तक गाड़ी चलाई।
बीमारी शरीर में थी।
लेकिन हिम्मत उनके अंदर थी।
19 साल का बेटा बना पिता की ताकत
इस पूरी यात्रा में अमित के साथ उनका 19 वर्षीय बेटा तनय था।
इतनी कम उम्र में उसके सामने अपने पिता की ज़िंदगी से जुड़ा इतना बड़ा फैसला था।
लेकिन तनय घबराया नहीं।
उसने अपने पिता का साथ दिया, अस्पताल में आवश्यक सहमति दी और हर मुश्किल समय में परिवार को भरोसा दिलाता रहा—
“सब ठीक हो जाएगा।”
और फिर… वे समय पर पहुँच गए
करीब 1,400 किलोमीटर की यात्रा के बाद अमित और तनय DMC&H, लुधियाना पहुँचे।
डोनर लिवर तैयार था।
समय बहुत कम था।
अमित को तुरंत सर्जरी के लिए तैयार किया गया।
नवंबर 2025 में डॉ. गुरसागर सिंह सहोता और उनकी टीम ने अमित का कैडेवरिक लिवर ट्रांसप्लांट किया।
ट्रांसप्लांट सफल रहा।
अमित की रिकवरी अच्छी रही और 16 दिनों के बाद वे ICU से बाहर आ गए।
उनकी पत्नी नेहा के लिए यह पल भावुक कर देने वाला था।
जिस पति को उन्होंने बीमारी के कारण धीरे-धीरे कमजोर होते देखा था, वह अब दोबारा जीवन की ओर लौट रहा था।
आज कहानी बिल्कुल अलग है
अगस्त 2026 में अमित फिर पंजाब आए।
लेकिन इस बार कोई इमरजेंसी नहीं थी।
कोई घबराहट नहीं थी।
कोई दौड़ नहीं थी।
इस बार वे शुक्रिया कहने आए थे।
अमित, नेहा और तनय ने डॉ. सहोता से मुलाकात की और अमित ने उन्हें एक छोटा-सा उपहार दिया—उस नई ज़िंदगी के लिए प्यार और आभार का प्रतीक, जो उन्हें डॉ. सहोता और उनकी पूरी टीम की मदद से मिली।
आज अमित के लिवर फंक्शन टेस्ट सामान्य हैं।
वे वापस अपना व्यवसाय चला रहे हैं।
काम कर रहे हैं।
अपने परिवार के साथ सामान्य जीवन जी रहे हैं।
और सबसे बड़ी बात—आज वे खुद उन लोगों को प्रेरित कर रहे हैं जो जबलपुर और मध्य प्रदेश में लिवर सिरोसिस और गंभीर लिवर बीमारी से जूझ रहे हैं।
उनका संदेश साफ है—
“सही समय पर सही जगह पहुँचना आपकी ज़िंदगी बदल सकता है।”
वे अब लोगों को ऑर्गन डोनेशन और लिवर ट्रांसप्लांट के बारे में जागरूक भी कर रहे हैं।
एक सफ़र जिसने सब कुछ बदल दिया
जबलपुर से लुधियाना — 1,400 किलोमीटर।सिरोसिस से नई ज़िंदगी तक — एक सफ़र।एक पिता, एक बेटे और एक परिवार की उम्मीद का सफ़र।
कभी अमित को लगता था कि बीमारी उनकी ज़िंदगी उनसे छीन रही है।
आज वही अमित दूसरों से कहते हैं—
“उम्मीद मत छोड़िए। अगर लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत है, तो सही समय पर सही विशेषज्ञ तक पहुँचिए।”
और शायद यही इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात है—
एक दिन वे 1,400 किलोमीटर दूर अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए आए थे।आज वे उसी ज़िंदगी के लिए दूसरों में उम्मीद जगा रहे हैं।