लिवर सिरोसिस से नई ज़िंदगी तक: जम्मू के आशिष तल्ला की प्रेरणादायक लिवर ट्रांसप्लांट कहानी
बहन ने दिया अपने जिगर का हिस्सा, डॉक्टरों ने दी नई ज़िंदगी — यह सिर्फ़ एक लिवर ट्रांसप्लांट नहीं, बल्कि एक परिवार के पुनर्जन्म की कहानी है।
जब हर दिन ज़िंदगी से एक कदम दूर ले जा रहा था...
जम्मू निवासी श्री आशिष तल्ला पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से गंभीर लिवर बीमारी से जूझ रहे थे। शुरुआत में सामान्य लगने वाली समस्या धीरे-धीरे इतनी बढ़ गई कि उनका लिवर लगभग पूरी तरह खराब हो चुका था।
उन्हें लगातार पीलिया (जॉन्डिस) रहने लगा था। पेट में पानी भर जाता था (एसाइटिस), पैरों में सूजन रहती थी, कमजोरी इतनी बढ़ गई थी कि रोज़मर्रा के काम करना भी मुश्किल हो गया था। कई बार नाक से खून भी निकलता था।
सबसे कठिन बात यह थी कि उनका सामान्य जीवन पूरी तरह बदल चुका था।
न नमक खा सकते थे, न मन भर पानी पी सकते थे।
खाने की इच्छा खत्म हो गई थी और शरीर दिन-ब-दिन कमजोर होता जा रहा था।
परिवार के लिए यह समय बेहद चिंताजनक था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या किया जाए।
"हम अपने सामने आशिष को दिन-ब-दिन कमजोर होते देख रहे थे, लेकिन कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।"
डीएमसीएच लुधियाना में मिली उम्मीद की नई किरण
इलाज की तलाश में आशिष तल्ला और उनका परिवार डीएमसीएच लुधियाना पहुँचा, जहाँ उनकी मुलाकात प्रसिद्ध गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. अजीत सूद से हुई।
सभी आवश्यक जाँचों के बाद स्पष्ट हो गया कि उनका लिवर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो चुका है।
डॉ. अजीत सूद ने पूरी स्थिति समझाते हुए बताया कि अब केवल दवाओं से इलाज संभव नहीं है।
लिवर ट्रांसप्लांट ही जीवन बचाने का एकमात्र विकल्प था।
यह सुनकर परिवार घबरा गया।
लिवर ट्रांसप्लांट शब्द ही डर पैदा करने के लिए काफी था।
लेकिन यहीं से उनकी जिंदगी बदलने वाली थी।
डॉ. गुरसागर सिंह सहोता से वह मुलाकात जिसने डर को विश्वास में बदल दिया
इसके बाद परिवार की मुलाकात डीएमसीएच लुधियाना के चीफ लिवर ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. गुरसागर सिंह सहोता से हुई।
परिवार के अनुसार यह मुलाकात उनके लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
डॉ. सहोता ने लिवर ट्रांसप्लांट की पूरी प्रक्रिया विस्तार से समझाई। उन्होंने हर सवाल का जवाब दिया और परिवार को यह विश्वास दिलाया कि सही समय पर किया गया लिवर ट्रांसप्लांट मरीज को सामान्य जीवन वापस दे सकता है।
आशिष तल्ला बताते हैं:
"पहली मुलाकात के बाद ही हमारा डर काफी हद तक खत्म हो गया था। डॉक्टर साहब ने इतनी सरलता से सब कुछ समझाया कि हमें पूरा भरोसा हो गया कि हम सही जगह आए हैं।"
उनकी एक बात आज भी परिवार को याद है—
"भगवान पर, गुरुजी पर और टीम पर विश्वास रखिए, सब अच्छा होगा।"
और वास्तव में सब अच्छा हुआ।
जब बहन बनी भाई की जीवनदाता
अब सबसे बड़ी चुनौती थी एक उपयुक्त डोनर ढूँढना।
परिवार के कई सदस्यों की जाँच की गई।
फिर वह पल आया जिसने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी।
आशिष तल्ला की बहन, सुश्री अंजलि तल्ला, डोनर के रूप में उपयुक्त पाई गईं।
उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपने भाई को जीवन देने का निर्णय लिया।
उन्होंने अपने लिवर का 60% से अधिक हिस्सा दान करने की सहमति दी।
यह केवल एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं थी।
यह भाई-बहन के प्रेम, त्याग और समर्पण की ऐसी मिसाल थी जिसे शब्दों में बयान करना कठिन है।
एक बहन ने अपने भाई को जीवन देने के लिए अपने शरीर का हिस्सा दे दिया।
"किसी भी भाई के लिए इससे बड़ा उपहार नहीं हो सकता।"
11 सितम्बर 2025: नई ज़िंदगी का दिन
11 सितम्बर 2025 को डीएमसीएच लुधियाना में लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया गया।
एक ओर अंजलि तल्ला का डोनर ऑपरेशन हुआ और दूसरी ओर आशिष तल्ला का लिवर ट्रांसप्लांट।
परिवार के लिए ऑपरेशन थिएटर के बाहर बिताया गया हर मिनट एक परीक्षा जैसा था।
लेकिन भगवान की कृपा, सतगुरु जी के आशीर्वाद और डॉक्टरों की मेहनत से ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा।
उम्मीद से भी तेज़ रिकवरी
ऑपरेशन के बाद आशिष तल्ला की रिकवरी बहुत अच्छी रही।
जहाँ कई मरीजों को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ता है, वहीं आशिष तल्ला मात्र 14 दिनों में डिस्चार्ज हो गए।
डोनर अंजलि तल्ला भी सुरक्षित और स्वस्थ रहीं।
परिवार के अनुसार पूरे इलाज के दौरान डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ, आईसीयू टीम और ट्रांसप्लांट यूनिट ने जिस समर्पण से सेवा की, वह हमेशा याद रहेगी।
विशेष रूप से वे बताते हैं कि रिकवरी के दौरान विष्णु जी ने परिवार के सदस्य की तरह उनकी देखभाल की।
आज दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं
आज आशिष तल्ला और उनकी बहन अंजलि तल्ला दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं।
जो व्यक्ति कभी नमक नहीं खा सकता था, पानी नहीं पी सकता था और चलने में भी परेशानी महसूस करता था—
वह आज सामान्य भोजन करता है।
रोज़मर्रा के सभी काम करता है।
3–4 किलोमीटर तक आराम से पैदल चलता है।
सक्रिय और खुशहाल जीवन जी रहा है।
आशिष तल्ला कहते हैं:
"मैंने कभी नहीं सोचा था कि ट्रांसप्लांट के बाद मेरी जिंदगी इतनी सामान्य हो जाएगी। आज मैं वह सब कर सकता हूँ जो बीमारी से पहले करता था।"
अब उन्हें न खाने-पीने की पुरानी पाबंदियाँ हैं, न वही कमजोरी, न वही डर।
आज वे अपने परिवार के साथ एक सामान्य और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
अस्पताल नहीं, परिवार जैसा साथ
टल्ला परिवार विशेष रूप से डीएमसीएच लुधियाना की पूरी लिवर ट्रांसप्लांट टीम का धन्यवाद करता है।
वे कहते हैं कि यहाँ उन्होंने केवल इलाज नहीं पाया, बल्कि परिवार जैसा अपनापन भी महसूस किया।
विशेष धन्यवाद:
• डॉ. गुरसागर सिंह सहोता
• डॉ. अजीत सूद
• डॉ. संगम पपनेजा
• डॉ. पी. एल. गौतम
• डॉ. प्रतिक्षा पाटिल
• विष्णु जी
• पूरी लिवर ट्रांसप्लांट टीम, डीएमसीएच लुधियाना
परिवार के शब्दों में—
"यहाँ हर व्यक्ति अपना काम पूरी निष्ठा से करता है। डॉक्टर, नर्स और स्टाफ सभी ने हमें ऐसा महसूस कराया जैसे हम उनके अपने परिवार का हिस्सा हों।"
जम्मू से लुधियाना तक की यात्रा — और एक नई शुरुआत
जम्मू से पंजाब आकर लिवर ट्रांसप्लांट करवाना परिवार के लिए एक बड़ा निर्णय था।
लेकिन आज आशिष तल्ला मानते हैं कि यह उनके जीवन का सबसे सही निर्णय था।
उनके अनुसार उपचार की पूरी प्रक्रिया व्यवस्थित, पारदर्शी और भरोसेमंद रही।
उन्हें कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वे अपने घर से दूर हैं।
लिवर सिरोसिस मरीजों के लिए आशिष तल्ला का संदेश
आशिष तल्ला उन सभी मरीजों को एक संदेश देना चाहते हैं जो लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर या गंभीर लिवर रोग से जूझ रहे हैं।
"निराश मत होइए।
मैं स्वयं इस कठिन रास्ते से गुज़रा हूँ।
जब डॉक्टर आपको लिवर ट्रांसप्लांट की सलाह दें, तो डरिए मत। सही समय पर किया गया लिवर ट्रांसप्लांट जीवन बचाता है और आपको सामान्य जीवन वापस दे सकता है।
आज मैं इसका जीता-जागता उदाहरण हूँ।"
परिवार की ओर से भावपूर्ण धन्यवाद
आशिष तल्ला, उनकी पत्नी दीपाली तल्ला और उनकी बहन अंजलि तल्ला अपनी नई जिंदगी के लिए ईश्वर, सतगुरु जी और डीएमसीएच लुधियाना की पूरी टीम का हृदय से धन्यवाद करते हैं।
उनके शब्दों में—
"मेरी बहन ने मुझे अपने जिगर का हिस्सा दिया, और डॉ. गुरसागर सिंह सहोता तथा उनकी टीम ने मुझे नई ज़िंदगी दी।"
परिवार आगे कहता है—
"डॉ. गुरसागर सिंह सहोता सर ने हमें सिर्फ इलाज नहीं दिया, बल्कि हमारा परिवार वापस लौटा दिया। यह एहसान हम जीवन भर नहीं भूल सकते।"
आज आशिष तल्ला की कहानी सिर्फ एक सफल लिवर ट्रांसप्लांट की कहानी नहीं है।
यह विश्वास, परिवार, अंगदान, चिकित्सा उत्कृष्टता और नई जिंदगी की कहानी है।
यह कहानी बताती है कि जब परिवार साथ खड़ा हो, एक बहन अपने भाई के लिए अपना जिगर दान कर दे, और सही समय पर सही चिकित्सा मिल जाए, तो असंभव लगने वाली परिस्थितियाँ भी बदली जा सकती हैं।
नई जिंदगी का दूसरा नाम — लिवर ट्रांसप्लांट
कभी जो व्यक्ति पीलिया, पेट में पानी, कमजोरी और जीवन की अनिश्चितता से जूझ रहा था, वही आज सामान्य भोजन करता है, कई किलोमीटर पैदल चलता है, अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन जी रहा है और भविष्य के सपने देख रहा है।
आशिष तल्ला और उनका परिवार आज भी उस दिन को याद करता है जब उन्हें बताया गया था कि लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प है।
उन्हें नहीं पता था कि वही निर्णय उनकी जिंदगी बदल देगा।
आज उनका संदेश स्पष्ट है—
"लिवर ट्रांसप्लांट अंत नहीं, एक नई शुरुआत है।"
मरीज विवरण
मरीज: श्री आशिष तल्ला
डोनर: सुश्री अंजलि तल्ला (बहन)
निवास: जम्मू
बीमारी: एडवांस्ड लिवर सिरोसिस
लक्षण: पीलिया, पेट में पानी (एसाइटिस), पैरों में सूजन, नाक से खून आना, अत्यधिक कमजोरी
उपचार: लिविंग डोनर लिवर ट्रांसप्लांट
ट्रांसप्लांट तिथि: 11 सितम्बर 2025
अस्पताल: डीएमसीएच, लुधियाना